कांग्रेस ने केरल में संभाली स्थिति, लेकिन कर्नाटक को लेकर बढ़ी चिंता
बेंगलुरु | कांग्रेस पार्टी के लिए आंतरिक चुनौतियाँ और मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। केरल में मुख्यमंत्री पद के तीन दावेदारों के बीच चले 10 दिनों के लंबे मंथन के बाद जैसे ही पार्टी ने एक नाम पर मुहर लगाई, वैसे ही पड़ोसी राज्य कर्नाटक का सियासी घमासान एक बार फिर सतह पर आ गया है। सूत्रों के अनुसार, कर्नाटक कांग्रेस के भीतर शीर्ष सत्ता पर काबिज होने की पुरानी जंग दोबारा शुरू हो गई है। पिछले साल चुनावी राज्यों पर ध्यान केंद्रित करने के चलते जिस विवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था, वह अब पूरी तरह गरमा चुका है। नवंबर में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बीच का यह टकराव खुलकर सामने आया था, जिसे आलाकमान ने बिना किसी स्थायी समाधान के अस्थाई रूप से शांत कर दिया था।
सिद्धारमैया का कैबिनेट प्लान बनाम शिवकुमार की मुख्यमंत्री बनने की चाह
वर्तमान में कर्नाटक कांग्रेस के भीतर दो अलग-अलग रणनीतियों पर काम चल रहा है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी कैबिनेट में फेरबदल करने और खाली पड़े मंत्रालयों को भरकर सरकार और विधायक दल पर अपनी पकड़ को और मजबूत करना चाहते हैं। दूसरी तरफ, डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार इसी कार्यकाल के भीतर मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने की अपनी महत्वाकांक्षा को लेकर अड़े हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस समय मंत्रिमंडल में विस्तार या फेरबदल होता है, तो सिद्धारमैया का पलड़ा भारी हो जाएगा, जिससे शिवकुमार के लिए नेतृत्व परिवर्तन की राह और मुश्किल हो जाएगी।
'वेट एंड वॉच' की नीति और पोस्टर वॉर से बढ़ीं अटकलें
इस सियासी रस्साकशी के बीच सिद्धारमैया खेमा फिलहाल 'देखो और इंतजार करो' की रणनीति पर चल रहा है, जबकि शिवकुमार समर्थक आलाकमान को सरकार गठन के समय हुए कथित 'पावर शेयरिंग फॉर्मूले' (सत्ता-साझाकरण समझौते) की याद दिला रहे हैं। इस विवाद को हवा तब और मिल गई जब डीके शिवकुमार के जन्मदिन के मौके पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) दफ्तर के बाहर और राज्य के कई हिस्सों में उन्हें 'कर्नाटक का अगला मुख्यमंत्री' बताते हुए पोस्टर लगा दिए गए। यहाँ तक कि मैसूर में समर्थकों ने उन्हें भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करते हुए केक भी काटा। इसके अलावा, कई विधायक भी मंत्री पद की आस में दोनों गुटों के बीच अपनी लॉबिंग तेज कर चुके हैं।
दोनों दिग्गजों की मांगें और आलाकमान के सामने खड़ी धर्मसंकट की स्थिति
इस पूरे विवाद में दोनों नेताओं की प्राथमिकताएं पूरी तरह स्पष्ट हैं:
- सिद्धारमैया का पक्ष: वे मंत्रिमंडल में नए चेहरों को शामिल कर खाली पदों को भरना चाहते हैं, ताकि स्थानीय निकाय और ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (GBA) के चुनावों तक नेतृत्व के मुद्दे को टाला जा सके और बतौर सीएम उनकी स्थिति मजबूत बनी रहे।
- डीके शिवकुमार का पक्ष: वे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक जीत का श्रेय चाहते हैं और कथित वादे के मुताबिक मुख्यमंत्री की कमान संभालना चाहते हैं। यदि उन्हें शीर्ष पद मिलता है, तो वे प्रदेश अध्यक्ष का पद छोड़ने को भी तैयार हैं।
इस स्थिति ने कांग्रेस आलाकमान के सामने बड़ी मुश्किल खड़ी कर दी है। अब तक मामले को लटकाए रखना सबसे सुरक्षित रास्ता था, लेकिन दोनों गुटों के बढ़ते सार्वजनिक दबाव के कारण अब फैसले को टालना नामुमकिन होता जा रहा है। आलाकमान जो भी फैसला लेगा—चाहे सिद्धारमैया को बनाए रखने का हो या शिवकुमार को कमान सौंपने का—पार्टी को किसी न किसी धड़े के तीव्र विरोध का सामना करना ही पड़ेगा।
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