स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या विशेष

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सीताराम रूसिया ने पूरा जीवन देश के नाम समर्पित कर दिया था: अभिषेक त्रिपाठी 

नौगांव से अभिषेक त्रिपाठी "गुड्डू" @mplive24

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

बुंदेलखंड अंचल अपने आप में कई विविधताओं को समेटे हुये है। इस अंचल को ऐसी कई शख्सियतों को जन्म देने का सौभाग्य प्राप्त है जिन्होंने , विभिन्न क्षेत्रों में अपनी योग्यताओं, कार्यों, और पुरुषार्थ के बल पर इस माटी का मन बढ़ाया है। ऐसी ही एक विरली विभूति थे बुन्देलखंड़ के प्रसिद्ध समाज सेवी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी " श्री सीताराम रूसिया" । श्री रूसिया जी का पूरा जीवन संघर्ष और वलिदान की ऐसी गाथा है जो अपने आप में जाने कितने ही संस्मरणों और अनुभव को संजोये है।
श्री सीताराम रूसिया का जन्म 23 सितंबर 1923 को नौगांव कस्वे के नज़दीक अलीपुरा नामक गांव में हुआ था, उनके बाल्यकाल में ही उनका परिवार हरपालपुर में बस गया था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा हरपालपुर एवं नौगांव में हुई एवं इंटर की पढाई छतरपुर में अपनी नानी के घर पर हुई। इसी समय इनका विवाह सन 1940 में राष्ट्रकवि मैथिलि शरण गुप्त की नातिन सुशीला देवी से हुआ, बाद में राष्ट्रकवि के प्रभाव में आकर 1942 में वनारस हिन्दू विश्विद्यालय में बी ए की पढाई के दौरान ही भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े और 9 अगस्त 1942 को जब विश्वविद्यालय में कुलपति डॉ राधाकृष्णन गीता पर व्याख्यान कर रहे थे की, तभी समाचार प्राप्त हुआ की मुम्बई के आंदोलन में महात्मा गांधी समेत सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए हैं, जिससे छात्रों में रोष फ़ैल गया एवं श्री सीताराम रूसिया के नेतृत्व में आज़ादी के दीवाने उत्तेजित होकर तोड़फोड़ करने लगे, कभी रेल की पटरियां उखाड़ना कभी पल तोडना आदि रोज का क्रम बन गया। सबसे महत्वपूर्ण घटना कोर्ट में तिरंगा झंडा फहराने की थी, जिधर उनकी अग्नि परीक्षा थी, सीधा संघर्ष हिंसा और अहिंसा  के मध्य था। एक और आज़ादी के मतवाले कोर्ट की इमारत पर पाइपो के सहारे तिरंगा लिए ऊपर चढ़ते जाते थे, दूसर और उनके साथी पुलिस की गोलियों से शहीद भी होते जा रहे थे। परंतु रूसिया जी और उनके साथियों में इतना जोश था क़ि, शहीद होने की होड़ सी मची थी, उनके तीन चार साथी गोली लगने से शहीद हो गए थे, बाद में पुलिस बालों की अंतरात्मा ने अपने ही अधिकारियों के निर्देश मानने से मना कर दिया, जिससे आज़ादी के दीवानों ने कोर्ट में तिरंगा फहरा दिया था।

इसी प्रकार सन 1944 - 45 में कलकत्ता में जब आज़ाद हिंद फौज के कुछ सिपाहियों को देशद्रोह के आरोप में अंग्रेज  फांसी देना चाहते थे, तो रूसिया जी एवं अन्य सेनानियों ने बंगाल के सचिवालय " राइट्स बिल्डिंग" पर कब्ज़ा करने की योजना बनाई और जुलुस की शक्ल में आगे बढ़े तब, चौरंगी चौराहे  पर पुलिस ने मशीनगनों से गोलियां वरसाना शुरू कर दिया, जिसमे उनके कई साथी शहीद हो गए किन्तु आंदोलन कारियों कु विजय हुई और राइट्स बिल्डिंग पर कब्ज़ा कर लिया गया।

 


1946 में रूसिया जी वापिस छतरपुर आकर उत्तरदायी शासन हेतु चले आंदोलन में पंडित राम सहाय तिवारी जी के नेतृत्व में शामिल हुए, इस आंदोलन में मुख्य रूप से उनके साथी श्री बाबु राम चतुर्वेदी, श्रीमती विद्यावती चतुर्बेदी, श्री परमलाल अग्रवाल आदि थे। इस आंदोलन में श्री सीताराम रूसिया को मीडिया प्रभारी का कार्य सौंपा गया था, और बो महोबा में भूमिगत रह कर सत्याग्रह के समाचार टेलिग्रामों के जरिये अखवारों में प्रकाशित करवाते थे, जिन्हें पढ़ कर मैहर के राजा, दीवान और पुलिस कप्तान इतने बौखला गए थे की उन्होंने रूसिया जी को जिन्दा या मुर्दा पकड़ने के लिए जासूस भेजे थे, परंतु उन्हें पकड़ा नहीं जा सका और, अंततः हार मान कर उत्तरदायी शासन देकर पंडित राम सहाय तिवारी जी को मंत्री बनाया गया


 

इन सभी आंदोलनों में भाग लेने के दौरान रूसिया जी को पुलिस हमेशा पकड़ने का प्रयास करती रही परंतु रूसिया जी कभी भी पुलिस के हाथ नहीं लगे। उनका जीवन गाँधीवादी विचारधारा सड़ प्रभावित था। 1942 में हज उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाते समय आजीवन खादी पहनने का प्रण लिया था और जीवन पर्यंत खादी ही पहनी। देश स्वतंत्र होने के बाद कुछ दिन अपने पिता के साथ व्यापार करने के बाद जान सेवा करने के लिए व्यापार छोड़ कर वकालत की पढाई पूरी की एवं नौगांव में रह कर एक स्वच्छ छवि के वकील बन कर कार्य किया। उन्होंने हमेशा सत्य, अहिंसा एवं खादी  को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाये रखा। श्री सीताराम रूसिया कर्मठ व्यक्ति थे, खाली बैठना उन्हें पसंद नही था, 90 वर्ष की आयु होने तक भी वो लगातार वकालत का कार्य करते रहे, उस उम्र में भी उन्हें अक्सर साईकिल की सवारी करते हुए लोग देख कर अचरज करते थे। बुंदेलखंड के इस सपूत का देहांत 14 अगस्त 2013 को हृदयघात से हो गया। ईश्वर की इच्छा के अनुसार स्वंत्रता दिवस के दिन नौगांव में अपार जनसमूह द्वारा उन्हें पुरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गयी। उनका देहांत पूरे नौगांव एवं बुंदेलखंड के लिए अपूरणीय क्षति है। हम सब उन्हें नमन करते हैं और अपनी श्रधांजलि देते हैं।


 

( लेखक ने इस लेख से सम्बंधित सभी तथ्य पुराने अखवारों की कतरनों एवं उनके पुत्रों से

प्राप्त जानकारी के अनुसार लिखे हैं)


लेखक : अभिषेक त्रिपाठी "गुड्डू"

Source ¦¦ अभिषेक त्रिपाठी