सवाल दर सवाल,
 
संघ की समन्वय बैठक : समस्याएं, समाधान और संकल्प- राकेश अग्निहोत्री
 
भोपाल से राकेश अग्निहोत्री
 
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राजधानी भोपाल में संघ की अगस्त के अंतिम सप्ताह में होने वाली समन्वय बैठक का महत्व और बढ़ गया है। जब संघ और उसके अनुषांगिक संगठन जिसमें बीजेपी भी शामिल है, के नुमाइंदे मंथन करेंगे तब तक पीएम मोदी १५ अगस्त को दिल्ली में अपनी सरकार की दिशा तो शिवराज सिंह चौहान मध्यप्रदेश की अपनी सरकार की दिशा को रेखांकित कर चुके होंगे। यही नहीं जाति-धर्म की राजनीति में उलझी बीजेपी तिरंगा यात्रा की आड़ में राष्ट्रभक्ति और देशप्रेम का अलख जगाकर मतदाताओं को लुभाने का एक और दांव खेल चुकी होगी। ऐसे में संघ के सामने सरकार का खाका और उससे जनता की अपेक्षाओं को लेकर एक रोडमेप तैयार करने की चुनौती भी होगी चाहे फिर इसका मकसद मिशन १८ विधानसभा चुनाव ही क्यों न हो। सवाल खड़ा लाजमी है कि इस दौरान खास फोकस सरकार की उपलब्धियों के आंकलन के बीच समस्याओं के समाधान के साथ उस संकल्प को पूरा करने की चुनौती सामने होगी जो चुनावी गणित को एक बार फिर बीजेपी के पक्ष में कर सरकार फिर बनाने की सभी रुकावटों को दूर कर सके।
यूं तो देश में अलग-अलग राज्यों को लेकर संघ अपने एजेंडे के तहत अलग-अलग स्थानों पर क्षेत्रवार बैठकों का सिलसिला नए सिरे से शुरू करने जा रहा है जिसमें मध्यप्रदेश की राजधानी में छत्तीसगढ़ के साथ राजस्थान और गुजरात को लेकर भी विचार-विमर्श का दायरा बढ़ सकता है। २४ अगस्त से शुरू हो रही तीन दिन की इस बैठक में मुख्यमंित्रयों की मौजूदगी को लेकर संघ अभी तक किसी नतीजे पर भले ही नहीं पहुंच सका है लेकिन प्रदेश अध्यक्ष औऱ संगठन महामंत्री के अलावा कुछ और चुनिन्दा नेताओं की मौजूदगी के साथ दूसरे अनुषांगिक संगठनों के प्रतिनिधि भी भाग लेंगे। संघ प्रमुख मोहन भागवत को लेकर सस्पेंस यदि बरकरार है तो सह सर संघ चालक भैयाजी जोशी के साथ बीजेपी और संघ में समन्वय का काम देखने वाले कृष्णगोपाल ही नहीं, करीब एक साल के अध्ययन अवकाश से लौटे सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी भी इसमें शामिल हो सकते हैं। पिछले दिनों पहले दौर की बैठक दिल्ली में हो चुकी है जिसमें अलग-अलग राज्यों के नेता चाहे फिर वो प्रदेश का प्रतिनिधित्व करने वाले केंद्रीय मंत्री ही क्यों न हों, वो सभी विचार-विमर्श कर चुके हैं और अब यही लाइन आगे बढ़ रही है तो अब ऐसी बैठकों में जिसमें मध्यप्रदेश शामिल है, करीब ४ राज्यों के चुनिन्दा नेता शामिल होंगे तो फिर मुद्दे स्थानीय और प्रदेश स्तर के भी होंगे। यानी अगस्त के आखिरी हफ्ते में संघ की इस समन्वय बैठक पर मीडिया का भी फोकस रहेगा। इसे संयोग ही कहेंगे कि दूसरे प्रदेश में होने वाली बैठक की तुलना में भोपाल की इस समन्वय बैठक का महत्व इसलिए और बढ़ जाएगा क्योंकि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत राजस्थान और गुजरात के प्रतिनिधि यहां रहेंगे तो फिर मतलब साफ है कि चुनौती बीजेपी शासित इन राज्यों में बीजेपी की ही फिर बनाना प्रमुख एजेंडा रहेगा। गुजरात में नेतृत्व परिवर्तन के बाद बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने कुछ अहम संदेश अपनी ही राज्यों के सरकार को भी दे दिए हैं जिसमें बड़ा संदेश सरकार से जनअपेक्षाएं होंगी। अलग-अलग राज्यों की अलग-अलग समस्याएं हैं तो उसकी सियासी तासीर भी अलग-अलग है। गुजरात के मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार तीन बार बीजेपी सरकार बना चुकी है तो राजस्थान में सरकार बदलती रही है। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार हाल ही में कैबिनेट विस्तार के बाद मिशन-२०१८ की जमावट में जुट गई है लेकिन उसके सामने शहडोल लोकसभा और नेपानगर विधानसभा का उपचुनाव बड़ी चुनौती के तौर पर उस वक्त सामने है जब प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमारसिंह चौहान अपनी टीम का ऐलान अभी तक नहीं कर पाए हैं। पिछले दिनों मध्यप्रदेश सरकार के कुछ मंत्री समेत खुद सीएम, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री संघ के शीर्ष नेताओं के साथ एक छोटी समन्वय बैठक कर चुके हैं जिसमें ४ केंद्रीय मंत्री भी शामिल हुए थे। यानी समस्याओं से संघ अंजान नहीं है और अपने स्तर पर वह फीडबैक समय-समय पर इकट्ठा करता रहता है। यदि गुजरात और उत्तरप्रदेश को लेकर संघ सर्वे करा सकता है तो फिर दूसरे राज्यों में भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। मध्यप्रदेश में आदिवासी बहुल झाबुआ लोकासभ उप चुनाव में मिली हार केबाद यदि मंडीदीप, ईसागढ़, मैहर निकाय चुनाव के छोटे चुनाव में बीजेपी हार जाती है तो पर्दे के पीछे संघ के कान खड़े होना लाजमी है। हार जीत अपनी जगह है लेकिन संघ मुद्दों के साथ सरकार के प्रति जनता की सोच और बन रहे परसेप्शन को लेकर चिंतित है।दलित एजेंडे दे जुड़े पदोन्नति में आरक्षण को लेकर शिवराज का चर्चित बयान कोई माई का लाल आरक्षण छीन नहीं सकता, ने भी संघ को सोचने को मजबूर किया है और यदि शहडोल दौरे के दौरान अब मुख्यमंत्री सवर्णों के बच्चों को जाति धर्म से ऊपर उठकर स्कॉलरशिप का वादा कर रहे हैं तो फिर संघ की इस बैठक में समस्या के समाधान का स्थायी रास्ता भी खोजा जा सकता है।दलित उत्पीडन के साथ गौसेवा और गौरक्षा को लेकर देश में मचे बवाल की बात हो या फिर बीजेपी के कर्मठ, समर्पित और मूल कार्यकर्ता की उपेक्षा से जुड़ी समस्याएं ये वो मुद्दे हैं जिन पर संघ को नए सिरे से सोचना होगा। बीजेपी ही नहीं संघ के सामने बड़ी चुनौती जब यूपी में सरकार बनाना और उसके बाद गुजरात में अपनी सरकार बचाना है तब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में एंटी इन्कम्बैंसी का आशंका को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने की सबसे बड़ी चुनौती होगी जहां मध्यप्रदेश में शिवराज का चेहरा सामने रखकर उसे यदि चुनाव में जाना है तो तीन बार चोट खाई कांग्रेस की चुनौती पर भी पैनी नजर रखना होगी।
 
 
 
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार राकेश अग्निहोत्री स्वराज एक्सप्रेस मध्य प्रदेश/छत्तीसगढ़ में पॉलिटिकल एडिटर हैं।)
Source ¦¦ भोपाल से राकेश अग्निहोत्री