इन्दौर । शिव सर्वशक्तिमान है। वे मानव के साथ दानव और जीवों के भी देवता हैं। उनके विवाह में भूत-पे्रत से ले कर तमाम पशु-पक्षी भी शामिल हुए।शिव और पार्वती का विवाह श्रद्धा और विश्वास के मिलन का प्रतीक है। संसार में बिना श्रद्धा और विश्वास के एक पल के लिए भी सृष्टि का संचालन नहीं हो सकता। श्रद्धा अटूट और अखंड होना चाहिए। विश्वास भी डांवाडोल और खंडित होगा तो लक्ष्य नहीं मिलेगा।  भगवान शिव की महिमा इतनी व्यापक और प्रभावी है कि आज भी शिव के नाम से जपे गए मंत्रों का इतना प्रभाव है कि अनेक बीमारियां केवल मंत्रों से ही दूर हो जाती है।
नमः शिवाय मिशन ट्रस्ट शिवकोठी ओंकारेश्वर के संस्थापक एवं एक रोटी बाबाजी के नाम से प्रख्यात स्वामी शिवोहम भारती महाराज ने, आज गीता भवन सत्संग सभागृह में आंखों पर पट्टी बांधकर शिवपुराण की कथा में शिव-पार्वती विवाह के दिलचस्प प्रसंग सुनाते हुए उक्त विचार व्यक्त किए। कथा के दौरान संध्या को शिव-पार्वती विवाह का जीवंत उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। शिवजी की बारात भी निकली और उसमें शामिल नाना प्रकार के जीवों के दर्शन भी हुए। महाराजश्री के सान्निध्य में यहां 24 सितंबर तक सुबह 10 बजे से दिवंगत पितरों के मोक्ष का अनुष्ठान तथा दोपहर 2 से सांय 6.30 बजे तक शिव पुराण कथा का संगीतमय अनुष्ठान चल रहा है। कथा शुभारंभ के पूर्व समाजसेवी प्रेमचंद गोयल, विष्णु बिंदल, बालकृष्ण छावछरिया, दिनेश गुप्ता, महेश गुप्ता, मोहन मोदी, राजेंद्र गर्ग, त्रिपुरारीलाल शर्मा, मांगीलाल झंवर रामविलास राठी आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। कथा समापन की बेला में आरती के पूर्व अतिथियों द्वारा महाराजश्री की आंखों पर बंधी पट्टी खोली गई तो भक्तों ने भावविभोर होकर करतल ध्वनि से स्वागत किया। संचालन त्रिपुरारीलाल शर्मा ने किया और आभार माना महेश गुप्ता ने।
स्वामी शिवोहम भारती ने कहा कि शिव पुराण एक वृहद और विस्तारित ग्रंथ है। इसमें जीव मात्र के प्रति कल्याण के मार्ग दिखाए गए हैं। जीव और शिव के एकाकार होने और जन्म जन्मांतर के भटकाव से मुक्ति पाने के मंत्र इस पुराण में समाहित है। शिव और पार्वती का विवाह श्रद्धा और विश्वास के मिलन का प्रतीक है। सृष्टि का संचालन श्रद्धा और विश्वास से ही संभव है। न तो श्रद्धा में कमी आना चाहिए और न ही अंध श्रद्धा होना चाहिए। विश्वास के मामले में भी हमारा दृढ़ निश्चय जरूरी है। दोनों का विवाह श्रद्धा और विश्वास के एकाकार होने का संदेश है। जितनी श्रद्धा, उतना ही विश्वास होगा तो हमें अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रह जाएगा।