भोपाल। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य मुनिश्री अजीत सागर महाराज एलक दयासागर एवं एलक विवेकानंदसागर महाराज चौक जिनालय पहुँचे। गाजे-बाजे के साथ पाद-प्रच्छालन कर श्रद्धालुओं ने पंचायत कमेटी ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रमोद हिमांशु की अगुवाई में अगवानी की। मुनिसंघ ने चौक स्थित जिनालय के मूलनायक भगवान आदिनाथ जिन प्रतिमाओं की वंदना की, तत्पश्चात चौक धर्मशाला धर्मसभा का शुभारंभ आचार्य विद्यासागर महाराज के चित्र के समक्ष दीप-प्रज्वलन के साथ हुआ। चौक पाठशाला के बच्चों द्वारा संगीतमय स्वरलहरियों के साथ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के गुणों की वंदना की गई। ट्रस्ट के अध्यक्ष हिमांशु एवं अन्य ट्रस्टियों ने मुनिसंघ को श्रीफल समर्पित कर आशीर्वाद लिया। 
मुनिश्री अजीत सागर महाराज ने कहा आत्मा के दु:ख का कारण मोह, अज्ञान और रागद्ववेश है। इनसे बचने के लिए निरन्तर प्रभुभक्ति में लीन रहना चाहिए और गुरू के सानिध्य में उद्देश्य ग्रहण करते रहना चाहिए। मुनिश्री ने कहा द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भव परिवर्तन करते संसारी जीव असीम दु:खों को सहन कर रहा है। संसार में जीवों को जो सुख प्रतीत हो रहा है वह वस्तुत: सुखाभास है। सुखाभस सुख नहीं है अर्थात वह दु:ख ही है। सुख की अभिलाषा में संसारी प्राणि मृग-मारीचिवत् भ्रमित हो रहा है। संसार का प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है परन्तु वह सुख प्राप्ति का समीचीन उपाय नहीं कर रहा है। रत्नत्रयधर्म की आराधना ही सुख प्राप्ति का सम्यक साधन है। शाश्वत् सुख कहीं है तो मात्र सिद्धों को है, जो कर्म-कलंक से मुक्त हो गये हैं। मुनिश्री ने कहा कि यदि तुम्हारे परिणाम सहज ही कलुषित हो रहे हों, आस्थायें डगमगा रही हों तो समझ लेना तीव्र पाप कर्म का उदय चल रहा है। जब बीमारी आती है तो पहले से ही समझ में आने लगता है, जिसकी दुर्गति होना है, उसका पाप प्रवृत्ति में ही आनंद आता है। संतों की संगति से हृदय के कालुष्य की सफाई होती है और परिणामों में विशुद्ध बढ़ती है। मानसिक और शारीरिक बीमारियों की मूल जड़ व्यक्ति की विपरीत मानसिकता ही है। चिंता, संकलेश परिणाम ही दु:ख के कारण हैं।  
पंचायत कमेटी ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी अंशुल जैन ने बताया मुनि संघ के सानिध्य में 29 मई से 7 जून तक सर्वोदय सम्यग्ज्ञान विद्या शिक्षण शिविर का आयोजन हो रहा है, जिसमें आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की संघत्स ब्रम्हचारिणी भैया एवं दीदी के साथ विशेष रूप से सांगानेर संस्थान राजस्थान से विद्वान शिक्षण के लिए आ रहे हैं, जिसमें धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ दैनिक जीवनचर्या में संस्कृति और संस्कारों के साथ कैसे जीवन जियें आदि शिक्षायें दी जायेंगी।