हाथ की रेखाओं का विश्‍लेषण करते वक्‍त मंग्रल ग्रह और शनि का जिक्र न हो तो ऐसा संभव नहीं है। हनुमान जी को मंगल का ही दूसरा स्‍वरूप माना जाता है। भगवान राम के परम भक्‍त हनुमानजी ने अपने प्रभु की शक्ति के दम पर ही वानर सेना के साथ सेतु का निर्माण करके लंका पर विजय प्राप्‍त की। यदि किसी व्‍यक्ति के हाथ में मंगल का चिह्न अर्थात हनुमानजी का चिह्न हो तो शन‍ि की साढ़ेसाती और ढैय्या उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती…
यदि किसी व्‍यक्ति के हाथ में जीवन रेखा के साथ मंगल रेखा एक से अधिक अर्थात पहली बड़ी, दूसरी छोटी, तीसरी उससे भी छोटी हो तो यह हनुमान रेखा या मंगल रेखा कहलाती है। यदि मंगल ग्रह उठा हुआ हो तो व्‍यक्ति के हाथ में हनुमानजी की विशेष कृपा प्राप्‍त होती है।
द्वितीय मंगल पर यदि मस्तिष्‍क रेखा दो भाग में बंटी हो, मंगल उठा हुआ हो, वहां रेखाओं का जाल न हो, हाथ भारी हो, उंगलियां सीधी हों, खासकर शनि की उंगली मुड़ी या तिरछी न हो और न गुरु या सूर्य ग्रह पर झुकी हो तो व्‍यक्ति पर शनि की महादशा सा फिर साढ़ेसाती का कुप्रभाव नहीं पड़ता।
जीवन रेखा के साथ मंगल रेखा साफसुथरी हो, उसे राहु रेखा ने काटती हो और मंगल पर्वत पर शंख का चिह्न हो तो ऐसे व्‍यक्ति पर हनुमानजी की विशेष कृपा बनी रहती है।
अगर शनि ग्रह के नीचे हृदय रेखा स्‍पष्‍ट और उस पर कमल या फिर त्रिभुज स्‍पष्‍ट रूप से दिखाई देता हो तो जातक हनुमानजी का उपासक होता है। इस स्थिति में शनि भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता।
यदि किसी व्‍यक्ति के हाथ में हृदय रेखा के ऊपर 3 सीधी रेखाएं बनती हों और शनि की उंगली सीधी हो ओर आधार बराबर हो और मंगल ग्रह दोनों हाथों में उभार लिए हुए हो तो ऐसे जातक हनुमानजी की विशेष कृपा के पात्र होते हैं। कहते हैं कि ऐसी रेखाएं हनुमानजी के परभक्‍तों के ही हाथ में होती हैं। ऐसे भक्‍त जो कभी हनुमानजी का मंदिर बनाने में भी योगदान दे चुके हों।