कुम्भ मेला आस्था के साथ ही व्यवस्था का भी मेला है. इस बार का कुम्भ कुछ खास ही महत्त्व रखता है. प्रशासन ने भी इसे सदी का सबसे शानदार कुम्भ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. पूरे मेले को २० सेक्टरों में बांटा गया है. रंग-बिरंगी दुकानें, झूले और घर गृहस्थी के सामान तो आपको बाकी के मेलों में भी मिल जाएंगे. लेकिन कुम्भ मेले कि असली शान होते हैं यहां के अखाड़े. इस बार सेक्टर-12 से लेकर सेक्टर 16 तक आपको इन अखाड़ों की चमक नजर आएगी. इन अखाड़ों में आपको नागा साधु, भगवा कपड़े वाले साधु और साध्वियां, आशीर्वाद देते साधु, हवन करते साधु नजर आयेंगे. करीब से इन अखाड़ों को देखने पर समझ में आता है कि इन अखाड़ों कि व्यवस्था भी एक पूरे समाज जैसी ही है. यहां पर भी अलग-अलग कामों को करने के लिए लोग हैं. इन अखाड़ों कि अपनी एक दिनचर्या है और अपनी एक अलग दुनिया ही है.

अब दुनिया है तो वहां भी जुर्म और सजा देने का रिवाज होगा. कुम्भ मेले में हमनें अलग-अलग अखाड़ों के लोगों से बातचीत की और उनके अखाड़ों में मिलने वाली सजा के बारे में जानने की कोशिश की. यहां हमें सजा देने के बहुत से रोचक तरीकों के बारे में पता चला.

हिन्दू समाज के साधु कुल 13 अखाड़ों में बंटे हुए हैं. हर अखाड़े के कुछ नियम-कानून मिलते-जुलते हैं तो कुछ एक दुसरे से बिलकुल अलग हैं. इन अखाड़ों में एक एक महामंडलेश्वर होता है. इस तरह 13 महामंडलेश्वर मिलकर पंचों का चयन करते हैं. पंचों की इस कमेटी को रमता पंच कहा जाता है. उनके द्वारा लिया गया निर्णय सभी को मानना पड़ता है.

बड़ा उदासीन अखाड़े में साधुओं को सजा देने की बहुत मजेदार तरकीब है. यहां पर गलती करने वाले साधुओं से बड़े-बड़े हांडे धुलवाए जाते हैं. हांडे यानी वो बर्तन जिनमें पूरे अखाड़े का खाना बनता है. जिनती बड़ी गलती उतने ज्यादा हांडे धोने की सजा. सबसे बड़ी सजा होती है 80 हांडे धोने की.


इन अखाड़ों में आर्थिक दंड की कोई सजा नहीं होती. सभी मामलों में महामंडलेश्वर सजा तय करते हैं. लेकिन अगर अखाड़े के किसी पदाधिकारी से कोई गलती होती है तो उसे रमता पंचों के पास भेजा जाता है.