काशी की खूबसूरती बढ़ाई जा रही है. इसे क्योटो बनाने की कोशिश हो रही है, लेकिन वाराणसी की जनता के लिए सरकार का ये प्लान मुश्किल लेकर भी आया है. जिस तरह बेतहाशा इमारतें तोड़ी जा रही हैं, उससे तो काशी की ऐतिहासिक पहचान ही खतरे में पड़ सकती है.
इन दिनों वाराणसी की गलियों में ऐसी तस्वीरें आपको खूब दिखेंगी. कुदाल-फावड़े की आवाज आपको खूब सुनाई देंगी. दरअसल, ये तोडफोड़ उस योजना का हिस्सा है जिसके तहत गंगा घाट से मंदिरों तक सीधा रास्ता बनाया जा रहा है. 
काशी को क्योटो बनाने के इसी क्रम में काशी विश्वनाथ मंदिर के विस्तारीकरण के लिए बनारस के ललिता घाट से विश्वनाथ मंदिर तक दो सौ से अधिक भवन चिन्हित किए गए हैं, जिन्हें तोड़ा जा रहा है. इनमें प्राचीन मंदिर व मठ शामिल हैं. ये सभी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की ज़द में आने वाले मंदिर हैं. लेकिन इस योजना को लेकर सवाल सुलग रहे हैं.सवाल उठ रहे हैं कि क्या काशी को क्योटो बनाने के चक्कर में मंदिरों को मटियामेट किया जा रहा है. क्या प्रशासन सैकड़ों साल पुराने मंदिरों को तो नष्ट नहीं कर रहा. ये ऐसे मंदिर हैं जो हिंदुत्व की धरोहर हैं. इनसे काशी-काशी है. इनसे काशी शिव की नगरी है. तो कहीं खूबसूरत बनाने की कोशिश काशी का असली चेहरा तो खत्म नहीं कर रहा. इन तमाम सवालों पर लोगों की अलग-अलग दलील है.वाराणसी में सैकड़ों मजदूर रात-दिन लगकर तोड़फोड कर रहे हैं. प्रशासन ने करीब 236 इमारतों को अपने नियंत्रण में ले लिया है. कुछ की खरीद हुई है तो कुछ को जबरन खाली करा लिया गया है. क्योंकि खुद पीएम मोदी काशी को क्योटो बनाने का वादा कर चुके हैं.मोदी का वादा पूरा हो ये योगी की जिम्मेदारी है. इसलिए काशी में चौबीसों घंटे काम चल रहा है और फिर 2019 का चुनाव भी तो नजदीक आ चुका है. काशी साफ हो, सुंदर हो इस पर भला किसे ऐतराद हो सकता है लेकिन काशी का असली स्वरूप बना रहे ये भी तो जरूरी है.