मंदर नामक पर्वत पर दुदार्ंत नामक एक सिंह रहता था और वह सदा पशुओं का वध करता रहता था। तब सब पशुओं ने मिल कर उस सिंह से विनती की, सिंह एक साथ बहुत से पशुओं की क्यों हत्या करते हो ? जो प्रसन्न हो तो हम ही तुम्हारे भोजन के लिए नित्य एक पशु को भेज दिया करेंगे। फिर सिंह ने कहा -- जो यह तुमको इष्ट है तो यों ही सही। उस दिन से निश्चित किये हुए एक पशु को खाया करता था। फिर एक दिन एक बूढ़े शशक (खरगोश) की बारी आई।



त्रासहेतोर्विनीतिस्तु क्रियते जीविताशया।

पंच्त्वं चेद्गमिष्यामि किं सिंहानुनयेन में ?


वह सोचने लगा-- जीने की आशा से भय के कारण की अर्थात मारने वाले की विनय की जाती है और वह मरना ही ठहरा, फिर मुझे सिंह की विनती से क्या काम है ?


इसलिए धीरे- धीरे चलता हूँ, पीछे सिंह भी भूख के मारे झुंझला कर उससे बोला -- तू किसलिए देर करके आया है ? शशक बोला -- महाराज, मैं अपराधी नहीं हूँ, मार्ग में आते हुए मुझको दूसरे सिंह ने बल से पकड़ लिया था। उसके सामने फिर लौट आने की सौगंध खा कर स्वामी को जताने के लिए यहाँ आया हूँ। सिंह क्रोधयुक्त हो कर बोला -- शीघ्र चल कर दुष्ट को दिखला कि वह दुष्ट कहाँ बैठा है। फिर शशक उसे साथ ले कर एक गहरा कुँआ दिखलाने को ले गया। वहाँ पहुँच कर, स्वामी, आप ही देख लीजिए, यह कह कर उस कुँए के जल में उसी सिंह की परछाई दिखला दी। फिर सिंह क्रोध से दहाड़ कर घमंड से उसके ऊपर अपने को गिरा कर मर गया।