ये कहानी लखनऊ से दिल्ली पढ़ाई करने आई एक लड़की की है. जो पढ़ाई के दौरान तो हॉस्टल में रही, लेकिन नौकरी लगने के बाद किराए पर कमरा बेहद मुश्किलों से मिला. जब पहली दफा कमरा ढूंढने गई तो मकान मालकिन ने 'तुम ऐसा वैसा काम तो नहीं करती हो' जैसे सवालों से स्वागत किया.)

लखनऊ से स्कूलिंग के बाद दिल्ली पढ़ने आई. जाने माने कॉलेज में दाखिला हुआ. कॉलेज के ही हॉस्टल में सेपरेट रूम मिला, कोई परेशानी नहीं थी. असली संघर्ष शुरू हुआ कोर्स के बाद. ये संघर्ष नौकरी पाने का नहीं, रहने के लिए घर ढूंढने का था. 2016 में कोर्स के बाद नौकरी लगी. कमरा ढूंढने लगे. कॉलेज की तरफ से ही प्लेसमेंट हुई, दफ्तर दिल्ली के नेहरू प्लेस में था.

घर ढूंढना इतना मुश्किल काम है, जिसने ढूंढा हो सिर्फ वही समझ सकता है. जो कमरे पसंद आए वो बजट से बाहर था. लड़कियों को कमरा देने के लिए कोई राजी ही नहीं था. खूब चप्पलें घिसीं. आखिरकार कमरा मिला. दिल्ली के बेर सराय में. कोशिश तो थी, ऑफिस के पास लें. लेकिन भटकते भटकते दूर ही पहुंच गए. मकानमालकिन आंटी और हम आमने-सामने बैठे थे. मैं अपनी एक दोस्त के साथ गई थी, हमारी जॉइनिंग एक ही दफ्तर में हुई थी. रूम पार्टनर भी उसी को बनना था.

मकानमालकिन आंटी और हम-

आंटी- कहां काम करती हो?

मैं- प्रोफेशन बता दिया.

आंटी- ख़ुश. अरे वाह.

आंटी- ऑफिस कहां है?

दोस्त- नेहरू प्लेस में.

आंटी लहज़ा बदलकर, भौंहे तानकर- नेहरू प्लेस में???

फिर हमारे काम की पड़ताल हुई. बाल की खाल निकालने लगी. हम तफसील से बताते गए. लगभग 25-30 मिनट बाद, उन्हें समझ आया.

आंटी- लेकिन नेहरू प्लेस में तो बड़े अजीब अजीब काम होते हैं. वहां को लड़कियों से बातें वातें करवाते हैं. काफी गलत काम होते हैं वहां तो. पहले ही बता दो, कहीं तुम ऐसा वैसा काम तो नहीं करती हो.

हम दोनों असमंजस से एक दूसरे को देखते हुए. समझ नहीं आया कुछ भी. नेहरू प्लेस तो कमप्यूटर्स हब के लिए जाना जाता है. वहां के दफ्तर के बारे में कोई आइडिया नहीं था. उनके शक भरे सवालों से डर गए. कहीं किसी गलत जगह काम तो नहीं कर रहे हैं.

आंटी (आखिर में सफाई देते हुए)- बुरा मत मानना. मैंने तो ऐसे ही कह दिया. बस कमरा देने से पहले पता करना था, कहीं तुम लोग... ऐसी वैसी जगह काम तो नहीं करते हो?

पूरी जांच पड़ताल करने के बाद भी हमें कमरा नहीं दिया. फिर बाद में एक सीनियर के साथ मुनिरका के साथ शिफ्ट हुई. इसी दौरान कोर्स के बाकी साथी भी हॉस्टल से निकले थे. बहुत लड़कियों को रूम नहीं मिला था. उन्हीं सीनियर दीदी के साथ और भी दोस्त रहने आईं. उनके तीन कमरों के फ्लैट में हम 6 लड़कियां रहीं. जैसे-जैसे कमरे मिलते गए, सभी सैटल होते गए.

आज तक भी मुझे ये समझ नहीं आया, वो आंटी 'नेहरू प्लेस' जगह को क्या समझ रही थीं.