श्री भक्ति विचार विष्णु महाराज

मनुष्य मरणशील है, फिर क्यों वह सदा जीने, अधिक से अधिक ज्ञान अथवा हमेशा सुख पाने की इच्छा करता है? दूसरे शब्दों में कोई मनुष्य मरना नहीं चाहता, मूर्ख नहीं कहलवाना चाहता और न ही किसी प्रकार का दुख चाहता है। ऐसा क्यों?


आमतौर पर देखा जाता है कि ये तीन इच्छाएं होने के बावजूद मनुष्य इन्हें पूरा नहीं कर पाता। सत्य तो यह है कि मानव अपनी सीमित बुद्धि व इंद्रियों के बल पर नित्य जीवन, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण आनंद की प्राप्ति नहीं कर सकता। हालांकि पृथ्वी पर जन्म लेने वाले सभी प्रकार के प्राणियों में से मनुष्य को ही श्रेष्ठ कहा गया है। उसका कारण यह है कि मनुष्य अपने अच्छे-बुरे, नित्य-अनित्य में अंतर कर सकता है। पर उसमें अनेक कमियां हैं, जिनके चलते उसे बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर काटने पड़ते हैं।


ज्यादातर मनुष्य अपनी पहचान अपने शरीर से ही करते हैं। अगर किसी से प्रश्न करें कि आप कौन हैं तो वह अपना नाम बताता है, जिस नाम से उसे सभी पुकारते हैं। इसका कारण है कि मनुष्य को यही अहसास होता है कि वह एक शरीर है। मनुष्य यह भी महसूस करता है कि उसका अपना मन, बुद्धि, अहंकार है, किंतु वह जानता है कि उसके शरीर की एक सीमा है। इस सीमा का अहसास उसे ज्यादा तीव्रता से होता है क्योंकि वह इससे आगे बढ़कर कोई काम नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए मनुष्य बहुत दूर तक नहीं देख सकता, बहुत नजदीक भी नहीं देख सकता।


अपनी क्षमता से अधिक वह खा नहीं सकता, बहुत धीरे सुन नहीं सकता। जैसे मानव की शारीरिक क्षमता की सीमा है, उसी प्रकार उसके मन व बुद्धि की क्षमता की भी एक सीमा है। हमें अहंकार होने की पुष्टि होती है, जब हम यह सोचते-समझते हैं कि मैं इसका पिता हूं, मैं अमुक शहर का रहने वाला हूं, मैं इस देश का वासी हूं, मेरी यह राष्ट्रभाषा है, मैं इस संस्था का हूं, फलां जाति या फलां पोस्ट आदि का व्यक्ति हूं।


अब कोई यह प्रश्न कर सकता है कि व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत उसकी, भाषा, संस्था, जाति या पोस्ट आदि उसके लिए कितना मायने रखते हैं? यह भी पूछा जा सकता है कि मृत्यु के उपरांत क्या मन, बुद्धि, अहंकार का वजूद रहता है?


श्रीमदभगवत गीता के अनुसार सभी प्राणी भगवान की अपरा प्रकृति के अंश हैं। देखा जाए तो प्राणिमात्र भगवान जैसा ही है, क्योंकि भगवान और उनकी शक्ति एक ही हैं। किंतु जीव भगवान से अलग भी है क्योंकि वह भगवान की शक्ति का अंश है। जीवों की सभी शक्तियां मिलकर भी शक्तिमान के समान नहीं हो सकतीं। जैसे सूर्य की किरणें व उन किरणों के सभी कण मिल जाएं तो भी वे सूर्य के समान नहीं हो सकते। कह सकते हैं कि जीव भगवान से भिन्न होते हुए भी अभिन्न है। लेकिन भौतिक मन-बुद्धि में उलझे रहने के कारण मनुष्य इस सचाई को समझ नहीं पाता है।