आर.डी. अग्रवाल

एक असली चीज जो कि कल्पना से परे है, उसे कल्पना में मान लेना ही अंधविश्वास है। भगवान चूंकि मन, बुद्धि, कल्पना से परे है और हम उसे कल्पना से मानते हैं यही सबसे बड़ा धोखा है। कल्पना उस चीज की कर सकते हैं जो अस्तित्व में है ही नहीं, लेकिन जो है, चैतन्य है, उसकी कल्पना करने का क्या तुक? भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि ‘तू मुझे इन आंखों से नहीं देख सकता। मैं सबकी आत्मा में निवास करता हूं और ज्ञान द्वारा बोध प्राप्त कर मुझे प्राप्त किया जा सकता है।’


एक फकीर एक बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया और उसने बंजारे को एक गधा भेंट किया ताकि वह जीविकोपाजर्न कर सके। बंजारा बहुत खुश था, क्योंकि अब न तो उसे बोझा ढोना पड़ता और न ही पैदल यात्रा करनी पड़ती है। लेकिन एक समय लंबी यात्रा के दरम्यान वह गधा बीमार पड़ गया और परलोक सिधार गया। बंजारे ने एक गड्ढा खोदकर मृत गधे को दफना दिया और वहीं बैठकर रोने लगा। इतने में एक यात्री वहां से गुजरा। उसने बंजारे को वहां रोते देखा और मान लिया कि किसी महान व्यक्ति की मृत्यु हो गई है। वह थोड़ा सा झुकता है और वहां कुछ पैसे चढ़ा देता है। बंजारा हैरान हुआ। मगर जल्द ही उसे ख्याल आया कि इस तरह दूसरे यात्री भी आएंगे, पैसा चढ़ाएंगे तो उसका अच्छा खासा धंधा हो जाएगा। अब वह नित्य प्रति आता, वहां बैठकर रोने का ड्रामा करता। लोग आते, नतमस्तक होते और पैसा चढ़ाते। उसने उस स्थान को एक कब्र का रूप दे दिया। गांव-गांव खबर फैल गई कि किसी महान व्यक्ति की मृत्यु हो गई। परिणामस्वरूप गधे की कब्र महान व्यक्ति की समाधि बन गई।


एक रोज वही फकीर वहां दर्शन करने पहुंच जाता है। फकीर को बंजारे ने कहा, ‘यह उसी गधे की कब्र है, जो आपने मुझे दिया था। जीते जी तो उसने सेवा की ही, मरने के बाद भी सेवा कर रहा है।’ फकीर ने हंसते हुए कहा, ‘जिस गांव में मैं रहता हूं, वहां भी ऐसे ही महान व्यक्ति की कब्र है। तुझे पता है वह कौन है/ अरे भाई वह इसी गधे की मां की कब्र है।’ धर्म के नाम पर, ईश्वर के नाम पर इसी प्रकार का अंधविश्वास है लोगों में।


प्रेम रावत जी कहते हैं, ‘लोग वहां जाते हैं जहां भगवान आए थे, जहां भगवान ने विश्राम किया था। लेकिन वहां जाने के लिए कोई तैयार नहीं जहां साक्षात भगवान हैं। तुम्हारा असली भगवान तुम्हारे ही अंदर है, जो कि जीता जागता है। अपने उस भगवान के भी तो दर्शन करने चाहिए जो हर समय तुम्हारे साथ मौजूद रहता है। जहां भगवान है, वही तुम्हारा असली तीर्थ है। असली तीर्थ भी तुम्हारे ही अंदर है। वहां जाना चाहिए और परमानंद को प्राप्त करना चाहिए।’