आदमी जब फिसलता है तो खुद के शरीर का बोझ ही उसे पटक देता है। अखाड़ों में बड़े बड़े सूरमाओं को जो देंह पछाड़ देती है अटके वक्त में वही स्वयं की दुश्मन बन जाती है। कल तक जो खूबियां थी आज वही मजाक बना देती हैं। सार्वजनिक जीवन में प्रायः ऐसा हो जाता है। आदमी खुद के आभामंडल में कैद हो जाता है बाहर की दुनिया देख ही नहीं पाता। कोई सलाह भी दे तो दुश्मन। यह लगने लगता है कि हमारी प्रभुता से ये जलता है। यही सोच एक एक करके सही आदमी को बाहर करती है और चापलूसों को इकट्ठा जोड़ती है। यही चापलूस ऐसा तिलस्म रचते है कि वह मकड़ी के जाले में पतंगे की तरह फँस जाता है। राजनीति में प्रायः ऐसा होता है खासतौर पर सफलताएं जब सिर पर चढ़कर बोलने लगती हैं। तुलसी ने कई सूत्र दिए हैं जो अनपढों तक के बीच प्रचलित हैं। ..प्रभुता पाय काहि मद नाहीं.। और दूसरा वही चर्चित दोहा- 
सचिव,बैद,गुरु तीन जो प्रिय बोलहि भय आस।
राज,धरम,तन तीन का होंहि बेगही नास।।
ये था तुलसी के चित्रकूट की चुनाव कथा का मंगलाचरण, अब आगे की बात..
 
चित्रकूट का चुनाव छोटा था। पर चेतावनी बड़ी निकली है। हार जीत की समीक्षा उसी तय पैमाने पर होगी जिसमें होती आयी है। ऐसी समीक्षाओं से कुछ निकलता भी नहीं है,ये सिर्फ मीडियावी बुद्धिविलास भर होती हैं। चित्रकूट की तासीर और तेवर मैं अच्छे से जानता हूँ। रिपोर्टिंग की भाषा में हाई इन्टेंसिटी और मैन टु मैन हुए इस चुनावी मुकाबले में इलेक्शन कम रिजेक्शन ज्यादा हुआ। साफ लफ्जों में कहें तो जनता ने काँग्रेस को जिताया नहीं वरन् भाजपा को तबीयत से हराया है। उप चुनाव आमतौर पर सत्ताधारी दल के पक्ष में रहते हैं। वोटर इस गरज से भी वोट देते हैं कि चलो सरकार कुछ काम ही कर देगी। गाँव के प्रभावशालियों को सत्ता पक्ष के बड़े नेता मंत्रियों से भी संबंध बनने का अवसर मिल जाता है। यही कुछ ऐसे सहज कारण होते हैं कि उपचुनाव में अमूमन सत्ता पक्ष फायदे में रहा करता है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि भाजपा का संगठन काँग्रेस के मुकाबले कई गुना ज्यादा प्रभावशाली है और बड़ी बात यह कि यह चौबीस घंटे चलायमान रहता है। सत्ता व संगठन की इन खूबियों के बाद भी यदि भाजपा यहां से नहीं जीत पाई तो यकीन मानिए यहां की जनता ने भाजपा को रिजेक्ट किया है। इस रिजेक्शन में अगले साल होने वाले चुनाव की दृष्टि से गंभीर व खतरनाक संकेत छुपे हुए हैं।
 
पिछले चुनाव में प्रचार अभियान के समय एक रिपोर्टर की हैसियत से मैंने पूरा एक दिन मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान जी साथ बिताया था। यह देखने के लिए कि जनता की प्रतिक्रिया लेकर क्या है। कौन सी बात अपील करती है। ये जीतेंगे तो किस आधार पर और हारते हैं तो क्या वजहें होंगी। मेरे लिए यह चुनाव एडवेंचर दिलचस्प रहा। मैंने देखा पिछले विधानसभा चुनाव में शिवराज जी का जादू जनता के सिर चढ़कर बोलता था। सिर्फ यह सूचना देने की जरुरत होती थी कि फलाँ दिन, फँला जगह, इतने बजे इनकी सभा होनी है। कार्यकर्ताओं को सिवाय पंडाल लगाने के कुछ नहीं करना पड़ता था। छोटे से छोटे गांव की सभा में पता नहीं कहां से भीड़ प्रकट हो जाया करती थी। सभाओं में जिस उत्साह से बच्चे,उसी उत्साह से महिलाएं और बुजुर्ग  जमा होते थे। जाति-पाँति से ऊपर। यह साफ दिखता था भीड़ की दिलचस्पी प्रत्याशी से ज्यादा शिवराज सिंह से है। श्री चौहान भी उस क्षेत्र के उम्मीदवारी की पूरी जिम्मेदारी ले लेते थे। जो बोलते थे भीड़ की प्रतिक्रिया देखकर लगता था कि उसके दिल की बात बोल रहे हैं। और वे वाकई ऐसा ह्रदयग्राही बोलते भी थे। सभाएं व रोड शो रात-रात चलते थे। भीड़ में आए लोगों की प्रतिक्रिया सभी कुछ बयान कर देती थी। रीवा जिले के गुढ में दो लोगों की बातचीत में ऐसी प्रभावी प्रतिक्रिया निकली कि वही मेरी रिपोर्ट का शीर्षक बन गई। ..ये जो डेढ पसली का आदमी..। शिवराज जी की सभा के बाद एक श्रोता दूसरे से कह रहा था कि..ये जो डेढ़ पसली का आदमी है ना.देश के.बड़े-बड़े जोधाओं का बाजा बजा देगा। ये परसेप्शन था उस चुनाव में। गांव की गलियों से शिवराजजी  की मोटर निकलती तो बच्चे-बच्चियां मामा-मामा कहते हुए गाड़ी के साथ-साथ दौड़ते थे। कहीं गाड़ी रुकती तो किसी दलित के नाक बहाते बच्चे को सीने से लगा लेते और उसके माँ-बाप से हालचाल पूछते मानों कब का परिचय है। पिछला चुनाव इलेक्शन था। जनता ने जोरदारी के साथ शिवराज सिंह चौहान को चुना। उसके पिछले चुनाव से भी ज्यादा सीटें भाजपा की झोली में डालीं।
 
तो क्या शिवराज का तिलस्म सिमट रहा है..। इसका सीधा जवाब नहीं है। घुमाफिरा कर कहें तो यह कि उनका तिलस्म है अभी भी पर वह अब उनके ही आभामंडल में कैद होता जा रहा है। और यह इसलिए कि उनके इर्दगिर्द कार्यकर्ता नहीं इवेंट मैनेजर, ब्रांडिंग करने वाले व गैर राजनीतिक रायबहादुरों का घेरा है जो तिलस्म को फैलने ही नहीं देता। हाल यह कि जो नेता जनता की नब्ज उसके मनोभावों को देखते हुए समझ जाता था उसके सामने अब इवेंट मैनेजर प्रायोजित जनता प्रस्तुत कर देते हैं। पिछले चार सालों में हुए हर बड़े राजनीतिक जलसे इवेंट मैनेजरों ने रचे और भीड़ जुटाने की जिम्मेदारी रायबहादुरों ने उठाई। राजनीतिक प्रयोजनों के लिए सरकारी योजनाओं के प्रपंच रचे गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि सभी बड़े आयोजन बाक्स आफिस हिट रहे लेकिन इससे हुआ यह कि दूसरे तीसरे दर्जे के कार्यकर्ताओं के लिए रोजमर्रा के भी कोई राजनीतिक काम नहीं बचे। इवेंट मैनेजरों और रायबहादुरों ने जनता से उनका वो..डेढ़ पसली का एकल योद्घा छीन लिया..जिसमें वो अपने किस्म का राबिनहुड देखकर तृप्त हो लेते थे। पिछले तेरह वर्षों में ऐसा कुछ हुआ कि शिवराज सिंह की लकीर लार्जर दैन लाइफ हो गई या रच दी गई। पार्टी संगठन भी उन्हीं की छाया में पनाह पाने लगा है। आदमी का कद जब काम में नहीं आता तो फिर उसी का बोझ बन जाता हैं। कद की ऐसी रचना कभी कभी घातक हो जाती है। जिसमें कोई भागीदारी नहीं होती उसमें वही ही एक मात्र शामिल दिखता है। और कोई दोष न भी हो तो भी उसी के खोट और मीनमेख निकलने लगते हैं। अभी हफ्ते दस दिन चित्रकूट के उपचुनाव के जरिए यही चलेगा। यह सबक भी है आत्मावलोकन का, लेकिन -स्तुति करहिं सुनाय सुनाई.. वाले लोगों से जरा दूर रहकर। अगले चुनाव के साल भर शेष हैं। फिजा बदलने के लिए एक पल की हवा चाहिए। दोनों राजनीतिक दलों के लिए इस एक साल के पल-पल ऐसे ही बीतने वाले हैं।