बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि अपने शुरुआती समय में राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी बेहद शर्मीले स्‍वभाव के थे, वे न केवल दूसरों से बात करने में बल्‍कि कुछ कहने, आने-जाने में भी संकोच करते थे। गांधी जी का अध्‍ययन काफी था और वे कई किताबों के जरिये लगातार नित् नई जानकारी हासिल करने में अथक परिश्रम करते थे, लेकिन उसे मंचों पर किसी कार्यक्रम में साझा करना तो दूर की बात, वे अपने पास बैठे व्‍यक्‍ति से भी जानकारी को बताने में संकोच व लज्‍जा महसूस करते थे।

जानकर आश्‍चर्य होगा कि गांधी जी स्‍वभाव से इतने शर्मीले थे कि कई बार कई प्रसंगों पर उनकी बोलती भी बंद हो जाती थी, यही वजह है कि उन्‍होंने अपनी आत्‍मकथा में बाकायदा एक पाठ अपने इस शर्मीले स्‍वभाव और लज्‍जा को लेकर लिखा है। कमाल की बात है कि उन्‍होंने इसे अपनी कमजोरी नहीं माना, बल्‍कि शक्‍ति के रूप में इस्‍तेमाल किया है , तभी आत्‍मकथा में ऐसे प्रसंगों का शीर्षक 'लज्जाशीलता मेरी ढाल' के रूप में किया है।

 

अपनी आत्‍मकथा सत्‍य के प्रयोग में एक जगह वे कहते हैं : अन्नाहारी मण्डल की कार्यकारिणी में मुझे चुन तो लिया गया और उसमें मैं हर बार हाजिर भी रहता था, पर बोलने के लिए जीभ खुलती ही न थी। डॉ. औल्डफील्ड मुझसे कहते, 'मेरे साथ तो तुम काफी बाक कर लेते हो, पर समिति की बैठक में कभी जीभ ही नहीं खोलते हो। तुम्हें तो नर-मक्खी की उपमा दी जानी चाहिए।' मैं इस विनोद को समझ गया। मक्खियां निरन्तर उद्यमी रहती हों, पर नर-मक्खियां बराबर खाती-पीती रहती हैं और काम बिल्कुल नहीं करती। यह बड़ी अजीब बात थी कि जब दूसरे सब समिति में अपनी-अपनी सम्मति प्रकट करते, तब मैं गूंगा बनकर ही बैठा रहता था। मुझे बोलने की इच्छा न होती हो सो बात नहीं, पर बोलता क्या ? मुझे सब सदस्य अपने से अधिक जानकार मालूम होते थे। फिर किसी विषय में बोलने की जरूरत होती और मैं कुछ कहने की हिम्मत करने जाता, इतने में दूसरा विषय छिड़ जाता। यह चीज बहुत समय तक चली । इस बीच समिति में एक गंभीर विषय उपस्थित हुआ। उसमे भाग न लेना मुझे अन्याय होने देने जैसा लगा । गूंगे की तरह मत देकर शान्त रहने में नामर्दगी मालूम हुई।

ऐसे ही वे एक जगह कहते हैं : मेरी लज्जाशीलता विलायत में अन्त तक बनी रही। किसी से मिलने जाने पर भी, जहां पांच-सात मनुष्यों की मण्डली इकट्ठा होती वहां मैं गूंगा बन जाता था। एक बार मैं वेंटनर गया था। वहाँ मजमुदार भी थे। वहां के एक अन्नाहार घर में हम दोनो रहते थे। 'एथिक्स ऑफ डायेट' के लेखक इसी बन्दरगाह में रहते थे। हम उनसे मिले। वहां अन्नाहार को प्रोत्साहन देने के लिए एक सभा की गई। उसमें हम दोनो को बोलने का निमंत्रण मिला। दोनो ने उसे स्वीकार किया। मैने जान लिया था कि लिखा हुआ भाषण पढ़ने में कोई दोष नहीं माना जाता। मैं देखता था कि अपने विचारों को सिलसिले से और संक्षेप में प्रकट करने के लिए बहुत से लोग लिखा हुआ पढ़ते थे। मैने अपना भाषण लिख लिया। बोलने की हिम्मत नहीं थी। जब मैं पढ़ने के लिए खड़ा हुआ, तो पढ़ न सका। आंखो के सामने अंधेरा छा गया और मेरे हाथ-पैर कांपने लगे। मेरा भाषण मुश्किल से फुलस्केप का एक पृष्ठ रहा होगा। मजमुदार ने उसे पढ़कर सुनाया। मजमुदार का भाषण तो अच्छा हुआ। श्रोतागण उनकी बातो का स्वागत तालियों की गड़गड़ाहट से करते थे। मैं शरमाया और बोलने की अपनी असमर्थता के लिए दुःखी हुआ।

बहरहाल, गांधी ने भाषण, बोलने और विचारों को साझा करने के कई प्रसंगों का वर्णन अपनी आत्‍मकथा के इस हिस्‍से में किया है, लेकिन बाद में उन्‍होंने इस पूरे पाठ के माध्‍यम से मनुष्‍य की बोलने, बात करने और विचारों की अभिव्‍यक्‍ति के साथ ही जीवन में मौन की ताकत के बारे में भी कहा है।

इस तरह राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी का पूरा जीवन ही अनुभवों पर आधारित था। उन्‍होंने अपने जीवन में जो भी सुना, देखा उस पर महज विश्‍वास ही नहीं किया बल्‍कि उसे अपने जीवन में प्रयोग के स्‍तर पर भी आजमाया।

उपरोक्‍त अंश गांधी जी की आत्‍मकथा सत्‍य के प्रयोग से साभार हैं।